मरते दम ओ बेवफ़ा देखा तुझे
इक नज़र देखा तो क्या देखा तुझे
ऐ परी-रू क्यूँ न मैं दीवाना हूँ
बाल खोले बारहा देखा तुझे
निकहत-ए-गुल भी न लाई ता-क़फ़स
चल हवा हो ऐ सबा देखा तुझे
गिर्या-ए-बुलबुल पर उस ने हँस दिया
जिस ने ऐ गुलगूँ-क़बा देखा तुझे
दीद में हर-चंद सौ नुक़सान थे
फ़ाएदा इक ये हुआ देखा तुझे
हल्क़ा-ए-गेसू है गर्दन में पड़ा
आप अपना मुब्तला देखा तुझे
क्या तिरी नैरंगियाँ कीजे बयान
सब में और सब से जुदा देखा तुझे
बर्क़-ए-आफ़त आज ही हम पर गिरी
वर्ना हँसते बारहा देखा तुझे
आज तक ऐ बेकसी छोड़ा न साथ
एक साबित आश्ना देखा तुझे
दुज़्दी-ए-दिल का यक़ीं हो किस तरह
किस ने ऐ दुज़्द-ए-हिना देखा तुझे
हम ने 'ग़ाफ़िल' बुत-कदे में दहर के
एक मर्द-ए-बा-ख़ुदा देखा तुझे
ग़ज़ल
मरते दम ओ बेवफ़ा देखा तुझे
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

