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मरहले ज़ीस्त के आसान हुए | शाही शायरी
marhale zist ke aasan hue

ग़ज़ल

मरहले ज़ीस्त के आसान हुए

बाक़ी सिद्दीक़ी

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मरहले ज़ीस्त के आसान हुए
शहर कुछ और भी वीरान हुए

आस लगाओ पे हर इक शख़्स से लाग
थी नई बात कि हैरान हुए

वो नज़र उठने लगी दिल की तरफ़
हादसे अब मिरे अरमान हुए

आप को हम से शिकायत कैसी
हम तो ग़ाफ़िल हुए नादान हुए

दिल-ए-वारफ़्ता की बातें 'बाक़ी'
याद कर कर के पशेमान हुए