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मक़्सद हासिल नहीं हो या हो | शाही शायरी
maqsad hasil nahin ho ya ho

ग़ज़ल

मक़्सद हासिल नहीं हो या हो

दत्तात्रिया कैफ़ी

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मक़्सद हासिल नहीं हो या हो
जो होना है जल्द ऐ ख़ुदा हो

उल्फ़त है पास-ए-वज़्अ' का नाम
मरते मर जाओ पर निबाहो

दिल में नहीं ख़ूब मैल रखना
जो शिकवा गिला हो बरमला हो

क्या होता है फ़र्श बोरिया से
लाज़िम है कि क़ल्ब बे-रिया हो

इक जाम ही तो पिला दे लिल्लाह
ऐ पीर-ए-मुग़ाँ तेरा भला हो

दरकार उसे मदद है किस की
जिस को अल्लाह का आसरा हो

उस दिल की जलन जो देख पाए
शम-ए-सोज़ाँ चराग़-पा हो

क्या और भला कहूँ मैं तुम को
तुम हज़रत-ए-इश्क़ बद-बला हो

कहने को तो कह गए हो सब कुछ
अब कोई जवाब दे तो क्या हो

दिल ज़ीस्त से सर्द हो गया है
ऐ सोज़-ए-जिगर तिरा बुरा हो

बे-ऐब कोई नहीं है 'कैफ़ी'
गर हो तो वो ज़ात-ए-किब्रिया हो