EN اردو
मंज़िल-ए-यार बे-निशाँ भी नहीं | शाही शायरी
manzil-e-yar be-nishan bhi nahin

ग़ज़ल

मंज़िल-ए-यार बे-निशाँ भी नहीं

रईस नियाज़ी

;

मंज़िल-ए-यार बे-निशाँ भी नहीं
दिल हो ग़ाफ़िल तो राज़-दाँ भी नहीं

बर्क़ क्यूँ बे-क़रार है इतना
अब तो गुलशन में आशियाँ भी नहीं

हो नज़र में अगर हक़ीक़त-ए-हुस्न
ज़िंदगी सादा दास्ताँ भी नहीं

वो जफ़ाओं पे शर्मसार न हों
अब ये मंज़िल मुझे गराँ भी नहीं

यार की जुस्तुजू को क्या कहिए
राएगाँ भी है राएगाँ भी नहीं

दिल तक आए तो वजह-ए-तस्कीं हो
वो नज़र इतनी मेहरबाँ भी नहीं

अल्लाह अल्लाह सुरूर-ए-याद-ए-हबीब
अब मुझे हिज्र का गुमाँ भी नहीं

लब तक आ जाए तो क़यामत है
आशिक़ी कार-ए-बे-फ़ुग़ाँ भी नहीं

अज़्मत-ए-हुस्न इश्क़ से है 'रईस'
सर नहीं है तो आस्ताँ भी नहीं