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मंज़िल-ए-ग़म को पार कर लेंगे | शाही शायरी
manzil-e-gham ko par kar lenge

ग़ज़ल

मंज़िल-ए-ग़म को पार कर लेंगे

ख़लील मामून

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मंज़िल-ए-ग़म को पार कर लेंगे
दर्द-ए-दिल ही को यार कर लेंगे

तुम नहीं आओगे ख़बर है हमें
फिर भी हम इंतिज़ार कर लेंगे

जब तू जाएगा छोड़ कर हम को
तेरी यादों से प्यार कर लेंगे

ख़ून छिड़केंगे सूखी डालों पर
हम ख़िज़ाँ को बहार कर लेंगे

तुम मिलो तो सही कहीं हम को
इश्क़ बे-इख़्तियार कर लेंगे

कुछ नहीं मिल सका हमें 'मामून'
तुम मिलोगे तो प्यार कर लेंगे