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मैं तेरी निगह में इक चमन था | शाही शायरी
main teri nigah mein ek chaman tha

ग़ज़ल

मैं तेरी निगह में इक चमन था

कालीदास गुप्ता रज़ा

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मैं तेरी निगह में इक चमन था
ये हुस्न-ए-नज़र था हुस्न-ए-ज़न था

पक्का था जो मन का ख़स्ता-तन था
वो क़ैस कहाँ था कोहकन था

मख़मूर सी हो रही थीं आँखें
रुझान-ए-गुनाह ज़ौ-फ़गन था

दुनिया मक़्तल बनी थी और दिल
अपने ही ख़याल में मगन था

ग़म-ख़ाना हो के रह गया है
वो लफ़्ज़ जो माबद-ए-सुख़न था

उड़ता फिरता ग़ुबार हर-सू
ये दश्त-ए-रवाँ कभी चमन था

कहने को तो मर चुकी थी ख़्वाहिश
बाक़ी मगर उस का बाँकपन था

फ़नकार थे हम न थे कफ़न-कश
ज़िंदों के लिए हमारा फ़न था

क्या रूह दमक दमक उठी थी
कुंदन सा ख़याल का बदन था

गो होंट 'रज़ा' के सिल गए थे
ख़ामे की ज़बाँ से नग़्मा-ज़न था