मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़
सारा समुंदर इक तरफ़ आँसू का क़तरा इक तरफ़
उस आफ़त-ए-जाँ को भी चेहरा तो दिखाना ही न था
इक सम्त ईसा दम-ब-ख़ुद ग़श में है मूसा इक तरफ़
अपने समंद-ए-नाज़ को ऐ शहसवार आ छेड़ कर
सफ़-बस्ता हाज़िर कब से हैं महव-ए-तमाशा इक तरफ़
साक़ी बग़ैर अहवाल ये पहुँचा है मय-ख़ाने का अब
जाम इक तरफ़ है सुरंगों ख़ाली है मीना इक तरफ़
फ़ुर्क़त में सब अच्छे रहे दिल का मगर ये हाल है
ज़ख़्म इक तरफ़ बढ़ता गया दाग़-ए-सुवैदा इक तरफ़
दीदार-ए-जानाँ का भला क्यूँ कर तहम्मुल हो सके
तिरछी निगाहें एक सू ज़ुल्फ़-ए-चलीपा इक तरफ़
वो तेग़ ले के कहते हैं देखूँ तो हक़ पर कौन है
मैं इक तरफ़ 'शाद' इक तरफ़ सारा ज़माना इक तरफ़
ग़ज़ल
मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़
शाद अज़ीमाबादी

