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मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़ | शाही शायरी
main shad tanha ek taraf aur duniya ki duniya ek taraf

ग़ज़ल

मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़

शाद अज़ीमाबादी

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मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ और दुनिया की दुनिया इक तरफ़
सारा समुंदर इक तरफ़ आँसू का क़तरा इक तरफ़

उस आफ़त-ए-जाँ को भी चेहरा तो दिखाना ही न था
इक सम्त ईसा दम-ब-ख़ुद ग़श में है मूसा इक तरफ़

अपने समंद-ए-नाज़ को ऐ शहसवार आ छेड़ कर
सफ़-बस्ता हाज़िर कब से हैं महव-ए-तमाशा इक तरफ़

साक़ी बग़ैर अहवाल ये पहुँचा है मय-ख़ाने का अब
जाम इक तरफ़ है सुरंगों ख़ाली है मीना इक तरफ़

फ़ुर्क़त में सब अच्छे रहे दिल का मगर ये हाल है
ज़ख़्म इक तरफ़ बढ़ता गया दाग़-ए-सुवैदा इक तरफ़

दीदार-ए-जानाँ का भला क्यूँ कर तहम्मुल हो सके
तिरछी निगाहें एक सू ज़ुल्फ़-ए-चलीपा इक तरफ़

वो तेग़ ले के कहते हैं देखूँ तो हक़ पर कौन है
मैं इक तरफ़ 'शाद' इक तरफ़ सारा ज़माना इक तरफ़