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मैं रो के आह करूँगा जहाँ रहे न रहे | शाही शायरी
main ro ke aah karunga jahan rahe na rahe

ग़ज़ल

मैं रो के आह करूँगा जहाँ रहे न रहे

अमीर मीनाई

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मैं रो के आह करूँगा जहाँ रहे न रहे
ज़मीं रहे न रहे आसमाँ रहे न रहे

रहे वो जान-ए-जहाँ ये जहाँ रहे न रहे
मकीं की ख़ैर हो या रब मकाँ रहे न रहे

अभी मज़ार पर अहबाब फ़ातिहा पढ़ लें
फिर इस क़दर भी हमारा निशाँ रहे न रहे

ख़ुदा के वास्ते कलमा बुतों का पढ़ ज़ाहिद
फिर इख़्तियार में ग़ाफ़िल ज़बाँ रहे न रहे

ख़िज़ाँ तो ख़ैर से गुज़री चमन में बुलबुल की
बहार आई है अब आशियाँ रहे न रहे

चला तो हूँ पए इज़हार-ए-दर्द-ए-दिल देखूँ
हुज़ूर-ए-यार मजाल-ए-बयाँ रहे न रहे

'अमीर' जमा हैं अहबाब दर्द-ए-दिल कह ले
फिर इल्तिफ़ात-ए-दिल-ए-दोस्ताँ रहे न रहे