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मैं ने सोचा था मुझे मिस्मार कर सकता नहीं | शाही शायरी
maine socha tha mujhe mismar kar sakta nahin

ग़ज़ल

मैं ने सोचा था मुझे मिस्मार कर सकता नहीं

भारत भूषण पन्त

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मैं ने सोचा था मुझे मिस्मार कर सकता नहीं
अक्स तो मुझ पर पलट कर वार कर सकता नहीं

आइना ज़ाहिर तो कर सकता है ख़द्द-ओ-ख़ाल को
आइना एहसास का इज़हार कर सकता नहीं

मेरी चाहत और है मेरे मसाइल और हैं
ख़ुद को मैं हर बात पर तयार कर सकता नहीं

ख़ुद से समझौता किया है ज़िंदगी के नाम पर
इस से बढ़ कर ज़िंदगी को प्यार कर सकता नहीं

या तो अपने जिस्म की हद से निकलना छोड़ दे
साया है तो धूप से इंकार कर सकता नहीं

कश्तियाँ भी चाहिए और नाख़ुदा भी चाहिए
तू समुंदर तैर कर तो पार कर सकता नहीं

इस से बेहतर है कि ये अज़्म-ए-सफ़र ही छोड़ दे
रास्ते को तू अगर हमवार कर सकता नहीं