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मैं ने सिर्फ़ अपने नशेमन को सजाया साल भर | शाही शायरी
maine sirf apne nasheman ko sajaya sal bhar

ग़ज़ल

मैं ने सिर्फ़ अपने नशेमन को सजाया साल भर

शुजा ख़ावर

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मैं ने सिर्फ़ अपने नशेमन को सजाया साल भर
फ़स्ल-ए-गुल भी इस लिए आई है अब के डाल भर

बद-गुमानी आई तो ले जाएगी रिश्ते तमाम
देखना निकलेगी इन शीशों की हस्ती बाल भर

वो ज़माना ठीक था ईमान लाने के लिए
हैदर-ए-कर्रार भर ख़ैर और शर दज्जाल भर

आज मेरी अर्ज़ पर ज़ुल्फ़ें अगर खोलेगा वो
कल हसद की आग में जल जाएगा बंगाल भर

कर दिया चाक-ए-गरेबाँ ने तुझे भी मो'तबर
चल दिवाने तू भी अब जेब-ए-जुनूँ में माल भर

सज्दा भर ईमान बाक़ी रह गया है शैख़ का
और अक़ीदत-ए-बरहमन की रह गई है थाल भर

नेक-ओ-बद की कश्मकश में हैं किरामन-कातिबीन
चल 'शुजा' अब ख़ुद ही अपना नामा-ए-आमाल भर