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मैं ने कहा कि तजज़िया-ए-जिस्म-ओ-जाँ करो | शाही शायरी
maine kaha ki tajziya-e-jism-o-jaan karo

ग़ज़ल

मैं ने कहा कि तजज़िया-ए-जिस्म-ओ-जाँ करो

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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मैं ने कहा कि तजज़िया-ए-जिस्म-ओ-जाँ करो
उस ने कहा ये बात सुपुर्द-ए-बुताँ करो

मैं ने कहा कि बहार-ए-अबद का कोई सुराग़
उस ने कहा तआक़ुब-ए-लाला-ए-रुख़ाँ करो

मैं ने कहा कि सर्फ़-ए-दिल-ए-राएगाँ है क्या
उस ने कहा आरज़ू-ए-राएगाँ करो

मैं ने कहा कि इश्क़ में भी अब मज़ा नहीं
उस ने कहा कि अज़-सर-ए-नौ इम्तिहाँ करो

मैं ने कहा कि और कोई पंद-ए-ख़ुश-गवार
उस ने कहा कि ख़िदमत-ए-पीर-ए-मुग़ाँ करो

मैं ने कहा हम से ज़माना है सर-गराँ
उस ने कहा कि और इसे सर-गराँ करो

मैं ने कहा कि ज़ोहद सरासर फ़रेब है
उस ने कहा ये बात यहाँ कम बयाँ करो

मैं ने कहा कि हद्द-ए-अदब में नहीं 'ज़फ़र'
उस ने कहा न बंद किसी की ज़बाँ करो