मैं लिख कर हो सकूँगा सुर्ख़-रू क्या
क़लम क्या और क़लम की आबरू क्या
न सोचा काटने वाले ने इतना
हरी डाली की थी कुछ आरज़ू क्या
ज़रा जागे तो हम सीना-सिपर हों
अना को जो सुला दे वो लहू क्या
ज़मीं को आब-ओ-दाना दे के देखो
खिला देती है गुलज़ार-ए-नुमू क्या
अदू को ज़ेर कर लो फ़ासलों से
लड़ाई अब है लाज़िम दू-ब-दू क्या
ग़ज़ल
मैं लिख कर हो सकूँगा सुर्ख़-रू क्या
अरमान नज्मी

