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मैं लिख कर हो सकूँगा सुर्ख़-रू क्या | शाही शायरी
main likh kar ho sakunga surKH-ru kya

ग़ज़ल

मैं लिख कर हो सकूँगा सुर्ख़-रू क्या

अरमान नज्मी

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मैं लिख कर हो सकूँगा सुर्ख़-रू क्या
क़लम क्या और क़लम की आबरू क्या

न सोचा काटने वाले ने इतना
हरी डाली की थी कुछ आरज़ू क्या

ज़रा जागे तो हम सीना-सिपर हों
अना को जो सुला दे वो लहू क्या

ज़मीं को आब-ओ-दाना दे के देखो
खिला देती है गुलज़ार-ए-नुमू क्या

अदू को ज़ेर कर लो फ़ासलों से
लड़ाई अब है लाज़िम दू-ब-दू क्या