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मैं क्या बताऊँ कि तू क्या है और क्या हूँ मैं | शाही शायरी
main kya bataun ki tu kya hai aur kya hun main

ग़ज़ल

मैं क्या बताऊँ कि तू क्या है और क्या हूँ मैं

जमील मज़हरी

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मैं क्या बताऊँ कि तू क्या है और क्या हूँ मैं
हुजूम-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी में खो गया हूँ मैं

पिन्हा दे कोई मोहब्बत की एक कड़ी ज़ंजीर
कि क़ैद-ए-फ़र्ज़ से बाहर निकल गया हूँ मैं

सवाब को नई शक्लें जो दे रहा है तू
गुनाह के नए साँचे बना रहा हूँ मैं

जुनूँ मिरा ख़िरद-आसूदा-ए-नताएज है
ख़ुद अपने पाँव की ज़ंजीर ढालता हूँ मैं

मिरी नज़र में तजल्ली की क्या हक़ीक़त है
तजल्लियों की हक़ीक़त को देखता हूँ मैं

गिरा चुका था जिसे कल नज़र से अपनी 'जमील'
ग़ुरूर अब उसी पस्ती पे कर रहा हूँ मैं