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मैं जब भी क़त्ल हो कर देखता हूँ | शाही शायरी
main jab bhi qatl ho kar dekhta hun

ग़ज़ल

मैं जब भी क़त्ल हो कर देखता हूँ

रज़ी अख़्तर शौक़

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मैं जब भी क़त्ल हो कर देखता हूँ
तो अपनों ही का लश्कर देखता हूँ

मैं दुनिया अपने अंदर देखता हूँ
यहीं पे सारा मंज़र देखता हूँ

कभी तस्वीर कर देता हूँ उस को
कभी तस्वीर बन कर देखता हूँ

मुझे इस जुर्म में अंधा किया है
कि बीनाई से बढ़ कर देखता हूँ

नशात-ए-दीद था आँखों का जाना
कि अब पहले से बेहतर देखता हूँ

वो मंज़र जो नज़र आता है ख़ाली
ख़ुद अपने रंग भर कर देखता हूँ

वो चेहरा हाए वो चेहरा वो चेहरा
जिसे ख़ुद से भी छुप कर देखता हूँ