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मैं इज़्तिराब में हूँ शाम से सहर के लिए | शाही शायरी
main iztirab mein hun sham se sahar ke liye

ग़ज़ल

मैं इज़्तिराब में हूँ शाम से सहर के लिए

आजिज़ मातवी

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मैं इज़्तिराब में हूँ शाम से सहर के लिए
कोई चराग़ अता कर दे रात-भर के लिए

ख़ुदा बचाए तुम्हें ऐसी-वैसी नज़रों से
गले में डाल लो ता'वीज़ तुम नज़र के लिए

क़फ़स-नसीब हैं ना-आश्ना-ए-आज़ादी
ये क़ैद एक चुनौती है बाल-ओ-पर के लिए

निगाह-ए-बर्क़ में वो ख़ार से खटकने लगे
जो तिनके जम्अ' किए हम ने अपने घर के लिए

मसीह-ए-वक़्त तो ऐसी नफ़स सही लेकिन
इलाज है कोई ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जिगर के लिए

तुम्हारे हुस्न-ओ-अदा के हमीं शिकार नहीं
न जाने कितनों के दिल तुम ने बन-सँवर के लिए

तमाम-उम्र अँधेरे में कट गई यारब
कोई चराग़ अता कर हमारे घर के लिए

किसी के सामने सर ख़म करूँ मैं क्यूँ 'आजिज़'
बनी है मेरी जबीं उन के संग-ए-दर के लिए