मैं ही मतलूब ख़ुद हूँ तू है अबस
आज से तेरी जुस्तुजू है अबस
सादगी में है लाख लाख बनाव
आइना तेरे रू-ब-रू है अबस
मुझ को दोनों से कुछ मज़ा न मिला
दिल अबस दिल की आरज़ू है अबस
बाद आब आग ख़ाक गर्द-ए-रूह
ज़िश्त-रूयों में ख़ूब-रू है अबस
तूर-ओ-मूसा हैं ज़र्रे ज़र्रे में
कब तिरा जल्वा चार सू है अबस
लिपटे हैं ख़्वाब में वो दुश्मन से
हाथ याँ ज़ीनत-ए-गुलू है अबस
वाह 'माइल' ख़ुदी में ज़िक्र-ए-अना
चुप रहो तुम ये गुफ़्तुगू है अबस
ग़ज़ल
मैं ही मतलूब ख़ुद हूँ तू है अबस
अहमद हुसैन माइल

