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मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ | शाही शायरी
main dastaras se tumhaari nikal bhi sakta hun

ग़ज़ल

मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ

अज़ीज़ नबील

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मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ
ये सोच लो कि मैं रस्ता बदल भी सकता हूँ

तुम्हारे बाद ये जाना कि मैं जो पत्थर था
तुम्हारे बाद किसी दम पिघल भी सकता हूँ

क़लम है हाथ में किरदार भी मिरे बस में
अगर मैं चाहूँ कहानी बदल भी सकता हूँ

मिरी सिरिश्त में वैसे तो ख़ुश्क दरिया है
अगर पुकार ले सहरा उबल भी सकता हूँ

उसे कहो कि गुरेज़ाँ न यूँ रहे मुझ से
मैं एहतियात की बारिश में जल भी सकता हूँ