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मैं चुप कम रहा और रोया ज़ियादा | शाही शायरी
main chup kam raha aur roya ziyaada

ग़ज़ल

मैं चुप कम रहा और रोया ज़ियादा

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

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मैं चुप कम रहा और रोया ज़ियादा
यक़ीनन ज़मीं कम है दरिया ज़ियादा

शब-ए-वस्ल मुर्ग़-ए-सहर याद रखना
ज़बाँ काट लूँगा जो रोया ज़ियादा

मैं नाज़ुक-मिज़ाजी से वाक़िफ़ हूँ क़ासिद
इसी वज्ह ख़त में न लिक्खा ज़ियादा

दो बोसे लिए उस ने दो गालियाँ दीं
न लेना ज़ियादा न देना ज़ियादा

वो सैर-ए-चमन के लिए आ रहा है
अकड़ना न शमशाद इतना ज़ियादा

वो उतना ही बनता है हिर्स-ए-मुजस्सम
ख़ुदा जिस को देता है जितना ज़ियादा

अमल पर मुझे ए'तिमाद अपने कम है
ख़ुदा के करम पर भरोसा ज़ियादा

जो आँखें तिरे ख़ाक-ए-दर से हैं रौशन
मिलाया है शायद ममीरा ज़ियादा

मुझे उल्फ़त-ए-ज़ुल्फ़ जब से है 'परवीं'
बताते हैं वो जोश-ए-सौदा ज़ियादा