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मय-कदे के सिवा मिली है कहाँ | शाही शायरी
mai-kade ke siwa mili hai kahan

ग़ज़ल

मय-कदे के सिवा मिली है कहाँ

फ़रीद जावेद

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मय-कदे के सिवा मिली है कहाँ
और दुनिया में रौशनी है कहाँ

आरज़ूओं का इक हुजूम सही
फ़ुर्सत-ए-शौक़ खो गई है कहाँ

जितने वारफ़्ता-ए-सफ़र हैं हम
उतनी राहों में दिलकशी है कहाँ

साथ आए कोई कि रह जाए
ज़िंदगी मुड़ के देखती है कहाँ

ख़ुश-अदा सब हैं आश्ना 'जावेद'
अपनी आवारगी छुपी है कहाँ