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महव कर दी ज़ेहन से ग़म ने तिरी तस्वीर भी | शाही शायरी
mahw kar di zehn se gham ne teri taswir bhi

ग़ज़ल

महव कर दी ज़ेहन से ग़म ने तिरी तस्वीर भी

दिल अय्यूबी

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महव कर दी ज़ेहन से ग़म ने तिरी तस्वीर भी
दोनों दुश्मन हैं मिरी तक़दीर भी तदबीर भी

मुस्कुराती है मिरी आँखों में आँसू देख कर
किस क़दर बे-दर्द है ज़ालिम तिरी तस्वीर भी

किस क़दर नाज़ुक है एहसासात का आलम कि इश्क़
एक ही नश्शा है लेकिन ज़हर भी इक्सीर भी

इन के दीवानों की सज-धज को हिक़ारत से न देख
इश्क़ का ज़ेवर हैं नादाँ तौक़ भी ज़ंजीर भी

ऐ 'दिल' उस की याद है गोया उसी का आइना
मुज़्दा-ए-जाँ-बख़्श भी चलती हुई शमशीर भी