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मह-रू न हो और चाँदनी वो रात है किस काम की | शाही शायरी
mah-ru na ho aur chandni wo raat hai kis kaam ki

ग़ज़ल

मह-रू न हो और चाँदनी वो रात है किस काम की

मिर्ज़ा अज़फ़री

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मह-रू न हो और चाँदनी वो रात है किस काम की
हो वो भी पर ख़ल्वत न हो ये बात है किस काम की

दो बोसे या लग लो गले तब गालियाँ मीठी लगें
गर वो नहीं और ये नहीं सलवात है किस काम की

जब यार से होवे जुदा एक यार-ए-जानी दोस्तो
बाग़-ओ-बहार ओ जाम-ओ-मुल बरसात है किस काम की

है नस्ब में आली अगर रखता न हो इल्म-ओ-हुनर
इक ढेर से भी है बतर वो ज़ात है किस काम की