माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे
अहल-ए-जुनूँ ख़ुद क्या समझे हैं नासेह क्या समझाएँगे
शायद अश्क ओ आह से ही अब बार-ए-अलम कुछ हल्का हो
हम भी करेंगे शोला-फ़िशानी हम भी लहू बरसाएँगे
जी न सकेंगे जीने वाले तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के मगर
आप को भी कुछ वहशत होगी आप भी कुछ पछताएँगे
मिलना तेरा मुश्किल था तो जी लेते इस मुश्किल पर
पा कर तुझ को खोने वाले क्यूँकर जी बहलाएँगे
ग़ज़ल
माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे
अबु मोहम्मद सहर

