लुत्फ़ हो गर तू हो और मय-ख़ाना हो
मैं हूँ और मेरा दिल-ए-दीवाना हो
जिस ज़बाँ पर हो तिरा अफ़्साना हो
कोई हो अपना हो या बेगाना हो
याँ तो है दीदार से तेरी ग़रज़
दैर हो काबा हो या बुत-ख़ाना हो
जिस को देखा जलते ही देखा यहाँ
शम्अ हो आशिक़ हो या परवाना हो
हम को तो दो-गज़ ज़मीं दरकार है
शहर हो बस्ती हो या वीराना हो
दौर-ए-साक़ी में किसे गर्दिश नहीं
शीशा हो साग़र हो या पैमाना हो
क्या क़यामत हो जो 'अंजुम' हश्र में
कोई सौदाई कोई दीवाना हो
ग़ज़ल
लुत्फ़ हो गर तू हो और मय-ख़ाना हो
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

