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लुत्फ़ हो गर तू हो और मय-ख़ाना हो | शाही शायरी
lutf ho gar tu ho aur mai-KHana ho

ग़ज़ल

लुत्फ़ हो गर तू हो और मय-ख़ाना हो

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

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लुत्फ़ हो गर तू हो और मय-ख़ाना हो
मैं हूँ और मेरा दिल-ए-दीवाना हो

जिस ज़बाँ पर हो तिरा अफ़्साना हो
कोई हो अपना हो या बेगाना हो

याँ तो है दीदार से तेरी ग़रज़
दैर हो काबा हो या बुत-ख़ाना हो

जिस को देखा जलते ही देखा यहाँ
शम्अ हो आशिक़ हो या परवाना हो

हम को तो दो-गज़ ज़मीं दरकार है
शहर हो बस्ती हो या वीराना हो

दौर-ए-साक़ी में किसे गर्दिश नहीं
शीशा हो साग़र हो या पैमाना हो

क्या क़यामत हो जो 'अंजुम' हश्र में
कोई सौदाई कोई दीवाना हो