EN اردو
लुत्फ़ ही लुत्फ़ है जो कुछ है इनायत के सिवा | शाही शायरी
lutf hi lutf hai jo kuchh hai inayat ke siwa

ग़ज़ल

लुत्फ़ ही लुत्फ़ है जो कुछ है इनायत के सिवा

अर्श मलसियानी

;

लुत्फ़ ही लुत्फ़ है जो कुछ है इनायत के सिवा
है मोहब्बत से सिवा जो है मोहब्बत के सिवा

दोस्तों के करम-ए-ख़ास से बचने के लिए
कोई गोशा न मिला गोशा-ए-उज़्लत के सिवा

मुझ से शिकवा भी जो करते हैं तो ये कहते हैं
कुछ भी आता नहीं क्या तुझ को शिकायत के सिवा

आप के ख़त को मैं किस बात का ख़ुम्मार कहूँ
इस में सब कुछ है बस इक हर्फ़-ए-मोहब्बत के सिवा

जिस क़दर चाहूँ गुनाहों पे हँसूँ ख़ूब हँसूँ
ये इलाज और भी है अश्क-ए-नदामत के सिवा

शैख़ ही होगा जो मिलते नहीं दो-चार अयाग़
कौन आ सकता है मयख़ाने में हज़रत के सिवा

वो जो कहते हैं कि है फ़हम-ओ-फ़रासत हम से
ऐसे लोगों में सभी कुछ है फ़रासत के सिवा

नहीं मा'लूम कि क्यूँ रूह इसी से ख़ुश है
रंज तो और भी हैं रंज-ए-मोहब्बत के सिवा

रह गए राह-ए-अमानत में मलाएक थक कर
मरहला तय न हुआ ये मिरी हिम्मत के सिवा

तुम को मा'लूम हो ऐ शैख़-ओ-बरहमन तो कहो
और भी कोई इबादत है मोहब्बत के सिवा

इस नई बात को भी 'अर्श' कभी सोचा है
आज-कल शे'र में जिद्दत है तो जिद्दत के सिवा