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लिखूँ फ़िराक़ की गर वारदात वस्ली पर | शाही शायरी
likhun firaq ki gar wardat wasli par

ग़ज़ल

लिखूँ फ़िराक़ की गर वारदात वस्ली पर

मारूफ़ देहलवी

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लिखूँ फ़िराक़ की गर वारदात वस्ली पर
जुदा जुदा हूँ तपाँ मुफ़रिदात वस्ली पर

लिखा था मैं ने जो बख़्त-ए-सियाह का अहवाल
गिरी सियाही की आख़िर दवात वस्ली पर

हमारे यार ने तिफ़्ली में भी सिवाए सितम
लिखा नहीं रक़म-ए-इल्तिफ़ात वस्ली पर

ये बात निकले है अंदाज़ से कि अब 'मारूफ़'
लिखेगा उस लब-ए-शीरीं की बात वस्ली पर