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लिबास-ए-फ़क़्र में हम को जो ख़ाकसार मिले | शाही शायरी
libas-e-faqr mein hum ko jo KHaksar mile

ग़ज़ल

लिबास-ए-फ़क़्र में हम को जो ख़ाकसार मिले

दर्शन सिंह

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लिबास-ए-फ़क़्र में हम को जो ख़ाकसार मिले
उन्हीं के दर पे सलातीन-ए-रोज़गार मिले

वो राज़ जिस से सुलगता रहा है दिल कह दें
हमारे दिल सा अगर कोई राज़दार मिले

शराब ख़ाना-ए-चिश्ती में भी नज़र आए
हमें जो उलफ़्त-ए-नानक के बादा-ख़्वार मिले

ग़म-ए-जहाँ-निगरी का सफ़र-ए-क़यामत था
हर एक ज़र्रे के सीने में कोहसार मिले

कोई भी दूरी-ए-मंज़िल नहीं अगर 'दर्शन'
जहाँ को मेरा जुनून-ए-ख़िरद-शिकार मिले