लहू का ज़ाइक़ा ही जब ज़बान तक न गया
तो क्या अजब है जो ज़ख़्मों पे ध्यान तक न गया
वो एक वहम जो सर्माया-ए-फ़क़ीरी था
यक़ीं में इस तरह बदला गुमान तक न गया
बदल गई कहीं रस्ते में कीमिया उस की
उठा ग़ुबार मगर आसमान तक न गया
अना-परस्त थे ऐसे बदन तो फिर है बदन
हमारा साया कभी साएबान तक न गया
बता के रह गए सब दाव-पेच साहिल से
हवा के साथ कोई बादबान तक न गया
ख़ुदा का शुक्र कि मेरे ही जुर्म काफ़ी थे
फ़क़ीह-ए-शहर मिरे ख़ानदान तक न गया
हमारे तीर छुपाए नहीं गए थे 'मुनीर'
हमारा हात ही अपनी कमान तक न गया
ग़ज़ल
लहू का ज़ाइक़ा ही जब ज़बान तक न गया
मुनीर सैफ़ी

