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लहू का ज़ाइक़ा ही जब ज़बान तक न गया | शाही शायरी
lahu ka zaiqa hi jab zaban tak na gaya

ग़ज़ल

लहू का ज़ाइक़ा ही जब ज़बान तक न गया

मुनीर सैफ़ी

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लहू का ज़ाइक़ा ही जब ज़बान तक न गया
तो क्या अजब है जो ज़ख़्मों पे ध्यान तक न गया

वो एक वहम जो सर्माया-ए-फ़क़ीरी था
यक़ीं में इस तरह बदला गुमान तक न गया

बदल गई कहीं रस्ते में कीमिया उस की
उठा ग़ुबार मगर आसमान तक न गया

अना-परस्त थे ऐसे बदन तो फिर है बदन
हमारा साया कभी साएबान तक न गया

बता के रह गए सब दाव-पेच साहिल से
हवा के साथ कोई बादबान तक न गया

ख़ुदा का शुक्र कि मेरे ही जुर्म काफ़ी थे
फ़क़ीह-ए-शहर मिरे ख़ानदान तक न गया

हमारे तीर छुपाए नहीं गए थे 'मुनीर'
हमारा हात ही अपनी कमान तक न गया