लग रही जिस तरह लाला के सारे बन को आग
दिल को अपने दाग़ देव ऐ आशिक़ो और तन को आग
गुल पे ये शबनम नहीं पानी छिड़कती है बहार
हाए-रे किन्ने लगाई आ के इस गुलशन को आग
हम सियह-बख़्तों का क्यूँ-कर राएगाँ जावे वबाल
शाम नीं फूली ये लागी है फ़लक के तन को आग
चल 'यक़ीं' की बात पर ऐ 'इश्क़' हम भी जल मरें
क्या ही फूला है पलास और लग रही है बन को आग
ग़ज़ल
लग रही जिस तरह लाला के सारे बन को आग
इश्क़ औरंगाबादी

