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लग रही जिस तरह लाला के सारे बन को आग | शाही शायरी
lag rahi jis tarah lala ke sare ban ko aag

ग़ज़ल

लग रही जिस तरह लाला के सारे बन को आग

इश्क़ औरंगाबादी

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लग रही जिस तरह लाला के सारे बन को आग
दिल को अपने दाग़ देव ऐ आशिक़ो और तन को आग

गुल पे ये शबनम नहीं पानी छिड़कती है बहार
हाए-रे किन्ने लगाई आ के इस गुलशन को आग

हम सियह-बख़्तों का क्यूँ-कर राएगाँ जावे वबाल
शाम नीं फूली ये लागी है फ़लक के तन को आग

चल 'यक़ीं' की बात पर ऐ 'इश्क़' हम भी जल मरें
क्या ही फूला है पलास और लग रही है बन को आग