लफ़्ज़ों के सियह पैराहन में लिपटी हुई कुछ तनवीरें हैं
ऐ दीदा-वरो पहचानो तो किस हाथ की ये तहरीरें हैं
जाती हुई रुत कब रुकती है ऐ दिल ये अबस तदबीरें हैं
जो क़ैद हवाओं को कर लें क्या ऐसी भी कुछ ज़ंजीरें हैं
नग़्मा वो किस ने छेड़ा है बिछड़े हुए ग़म सब आन मिले
आवाज़ की लहरों पर लर्ज़ां सौ मोहर-ब-लब तस्वीरें हैं
आवारा हवा के झोंकों पर अक्सर ये गुमाँ गुज़रा जैसे
ये हम से परेशाँ-हालों की बे-सम्त-ओ-जेहत तक़दीरें हैं
इस शहर में ले कर आए हैं हम शबनम-ओ-गुल की सौग़ातें
आँखों में जहाँ अंगारे हैं हाथों में जहाँ शमशीरें हैं
कुछ ख़्वाब उजालों के हम ने देखे थे मगर ता-हद्द-ए-नज़र
जो ज़ुल्मत बन कर फैल गईं किन ख़्वाबों की ताबीरें हैं
क्यूँ आज की जानी-पहचानी शक्लों से नज़र मानूस नहीं
आँखों में जो फिरती रहती हैं किस दौर की ये तस्वीरें हैं
हम अपनी ज़ात के ज़िंदाँ से बाहर जो निकल आए भी तो क्या
क़दमों से जो लिपटी पड़ती हैं राहें ये नहीं ज़ंजीरें हैं
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ग़ज़ल
लफ़्ज़ों के सियह पैराहन में लिपटी हुई कुछ तनवीरें हैं
मख़मूर सईदी