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लाज़िम है बुलंद आह की रायत न करे तू | शाही शायरी
lazim hai buland aah ki rayat na kare tu

ग़ज़ल

लाज़िम है बुलंद आह की रायत न करे तू

रज़ा अज़ीमाबादी

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लाज़िम है बुलंद आह की रायत न करे तू
तस्ख़ीर अगर दिल की विलायत न करे तो

आँखों का बहे जाना सहा गिर्ये पर अफ़्सोस
अब भी अगर उस दिल में सरायत न करे तू

मैं मोड़ूँ न मुँह उस की जफ़ा से प करूँ क्या
इस वक़्त वफ़ा फिर जो किफ़ायत न करे तू

जमइय्य'त-ए-अग़्यार से डरते नहीं आशिक़
पर ख़ौफ़ ये है उन की हिमायत न करे तू

ऐ क़ासिद अगर नामा मिरा चाक करे यार
बेहतर है कि मुझ से भी रिवायत न करे तू

फिर कह तू चिमट कर न लें हम बोसा सो क्यूँकर
जब आप से गाली भी इनायत न करे तू

ऐ मीर-'रज़ा' तुझ को अभी उस से मिला दें
गर रश्क की फिर हम से शिकायत न करे तू