क्यूँकर ये तुफ़-ए-अश्क से मिज़्गाँ में लगी आग
शबनम से कहीं भी है नियस्ताँ में लगी आग
न उस से धुआँ निकले है न शो'ला उठे है
ये तुर्फ़ा हमारे दिल-ए-नालाँ में लगी आग
आतिश जो हमारे तन-ए-पुर-दाग़ की भड़की
दामन से बुझाई तो गरेबाँ में लगी आग
घर तू ने रक़ीबों का न ऐ आह जलाया
फिर क्या जो मिरे कुलबा-ए-इहजां में लगी आग
शाख़ें शजर-ए-बीद से आहू ने रगड़ कर
वो शो'ला निकाला कि बयाबाँ में लगी आग
तासीर तिरी देख ली ऐ आह-ए-शरर-बार
इक दिन न कभी गुम्बद-ए-गर्दां में लगी आग
अल्लाह-रे गर्मी-ए-मय अंगूर की 'ग़ाफ़िल'
इक जाम को पीते ही दिल-ओ-जाँ में लगी आग
ग़ज़ल
क्यूँकर ये तुफ़-ए-अश्क से मिज़्गाँ में लगी आग
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

