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क्यूँकर ये तुफ़-ए-अश्क से मिज़्गाँ में लगी आग | शाही शायरी
kyunkar ye tuf-e-ashk se mizhgan mein lagi aag

ग़ज़ल

क्यूँकर ये तुफ़-ए-अश्क से मिज़्गाँ में लगी आग

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

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क्यूँकर ये तुफ़-ए-अश्क से मिज़्गाँ में लगी आग
शबनम से कहीं भी है नियस्ताँ में लगी आग

न उस से धुआँ निकले है न शो'ला उठे है
ये तुर्फ़ा हमारे दिल-ए-नालाँ में लगी आग

आतिश जो हमारे तन-ए-पुर-दाग़ की भड़की
दामन से बुझाई तो गरेबाँ में लगी आग

घर तू ने रक़ीबों का न ऐ आह जलाया
फिर क्या जो मिरे कुलबा-ए-इहजां में लगी आग

शाख़ें शजर-ए-बीद से आहू ने रगड़ कर
वो शो'ला निकाला कि बयाबाँ में लगी आग

तासीर तिरी देख ली ऐ आह-ए-शरर-बार
इक दिन न कभी गुम्बद-ए-गर्दां में लगी आग

अल्लाह-रे गर्मी-ए-मय अंगूर की 'ग़ाफ़िल'
इक जाम को पीते ही दिल-ओ-जाँ में लगी आग