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क्यूँ कर चुभे न आँख में गुल ख़ार की तरह | शाही शायरी
kyun kar chubhe na aankh mein gul Khaar ki tarah

ग़ज़ल

क्यूँ कर चुभे न आँख में गुल ख़ार की तरह

दत्तात्रिया कैफ़ी

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क्यूँ कर चुभे न आँख में गुल ख़ार की तरह
भाई है दिल को एक तरहदार की तरह

हालत तलाश-ए-यार में ये हो गई मिरी
जाता हूँ बैठ बैठ दिल-ए-ज़ार की तरह

क्या दिल में ख़ार रश्क-ए-रुख़-ए-यार का चुभा
बिगड़ी हुई है क्यूँ गुल-ए-गुलज़ार की तरह

है कुछ न कुछ वहाँ भी असर दर्द-ए-इश्क़ का
आँख उन की भी है इस दिल-ए-बीमार की तरह

ऐ काश मेरे तार-ए-रग-ए-जाँ को तोड़ दे
क़ातिल की तेग़ यार के इक़रार की तरह

'कैफ़ी' बिठाएँ आँखों पे क्यूँ आप को न लोग
चुभती हुई है आप के अशआ'र की तरह