क्यूँ अँधेरों में रहें रात बसर होने तक
ख़ुद ही ख़ुर्शीद न बन जाएँ सहर होने तक
कितना अच्छा हो कि इस बार मरीज़-ए-शब-ए-ग़म
अच्छा हो जाए मसीहा को ख़बर होने तक
कितनी ही बार ख़यालों में तिरे पास गए
हम-सफ़र करते रहे वक़्त-ए-सफ़र होने तक
है ये तश्हीर-ए-मोहब्बत तो कहीं बा'द की चीज़
आप मिल सकते हैं दुनिया को ख़बर होने तक
दाग़-ए-दिल अपनी ही सोज़िश से बना है ख़ुर्शीद
और क्या गुज़रेगी क़तरे पे गुहर होने तक
ऐ दिल-ए-वा'दा-तलब फिर कोई तज्वीज़-ए-वफ़ा
इक नज़र और भी ताईद-ए-नज़र होने तक
तेरे साथ अपने भी जीने की दुआएँ माँगीं
हम-सफ़र साथ रहे ख़त्म-ए-सफ़र होने तक
हद भी होती है कोई तिश्ना-लबी की 'नूरी'
ख़ुद ही पी लेते हैं साक़ी की नज़र होने तक
ग़ज़ल
क्यूँ अँधेरों में रहें रात बसर होने तक
कर्रार नूरी

