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क्यूँ अँधेरों में रहें रात बसर होने तक | शाही शायरी
kyun andheron mein rahen raat basar hone tak

ग़ज़ल

क्यूँ अँधेरों में रहें रात बसर होने तक

कर्रार नूरी

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क्यूँ अँधेरों में रहें रात बसर होने तक
ख़ुद ही ख़ुर्शीद न बन जाएँ सहर होने तक

कितना अच्छा हो कि इस बार मरीज़-ए-शब-ए-ग़म
अच्छा हो जाए मसीहा को ख़बर होने तक

कितनी ही बार ख़यालों में तिरे पास गए
हम-सफ़र करते रहे वक़्त-ए-सफ़र होने तक

है ये तश्हीर-ए-मोहब्बत तो कहीं बा'द की चीज़
आप मिल सकते हैं दुनिया को ख़बर होने तक

दाग़-ए-दिल अपनी ही सोज़िश से बना है ख़ुर्शीद
और क्या गुज़रेगी क़तरे पे गुहर होने तक

ऐ दिल-ए-वा'दा-तलब फिर कोई तज्वीज़-ए-वफ़ा
इक नज़र और भी ताईद-ए-नज़र होने तक

तेरे साथ अपने भी जीने की दुआएँ माँगीं
हम-सफ़र साथ रहे ख़त्म-ए-सफ़र होने तक

हद भी होती है कोई तिश्ना-लबी की 'नूरी'
ख़ुद ही पी लेते हैं साक़ी की नज़र होने तक