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क्यूँ आ गए हैं बज़्म-ए-ज़ुहूर-ओ-नुमूद में | शाही शायरी
kyun aa gae hain bazm-e-zuhur-o-numud mein

ग़ज़ल

क्यूँ आ गए हैं बज़्म-ए-ज़ुहूर-ओ-नुमूद में

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

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क्यूँ आ गए हैं बज़्म-ए-ज़ुहूर-ओ-नुमूद में
आज़ाद मर्द हो के रहे हम क़ुयूद में

सालिक है क्यूँ तख़य्युल-ए-तर्क-ए-वजूद में
नक़्श-ए-सुवर का रंग है तेरे शुहूद में

जो आ गए तजल्ली-ए-तंज़ीह-ए-ज़ात में
महदूद किस तरीक़ से होंगे हुदूद में

राज़-ए-दरून-ए-पर्दा ज़े-रिंदान-ए-मस्त पुर्स
सालिक है क्यूँ हिजाब-ए-शुहूद-ओ-वजूद में

अरिनी ओ लन-तरानी का सब राज़ खुल गया
क्या नश्शा-ए-ग़रीब है शर्ब-उल-यहूद में

ऐ गुल जहाँ में जिन को तिरा इश्क़ हो गया
वो ख़ार से खटकते हैं चश्म-ए-हुसूद में

मशहूर-ए-ख़ल्क़ जो है वो मक़्बूल-ए-हक़ नहीं
क्यूँ अहमक़ों को नाज़ हुआ है नुमूद में

ताअत नहीं है वो कि जो हो बे-हुज़ूर-ए-क़ल्ब
ऐ शैख़ क्या धरा है रुकू-ओ-सुजूद में

है बुल-अजब ये ज़मज़मा-ए-सौत-ए-सरमदी
किस तरह आए मा'रिज़-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद में

सूफ़ी ये सहव महव हुए सद्द-ए-बाब-ए-उंस
क्या इम्बिसात कार-गह-ए-हसत-ओ-बूद में

तार-ए-नफ़स से है तन-ए-ख़ाकी बसा हुआ
है अंकबूत लिपटी हुई तार-ओ-पूद में

सूफ़ी यही है नूर-ए-सवाद-ए-हिजाब-ए-क़ल्ब
ज़ुल्मत हुई जो सीना-ए-सोज़ाँ के दूद में

फ़ैज़-ए-निगाह-ए-रहबर-ए-कामिल का है असर
'साक़ी' है महव ताअत-ए-रब्ब-ए-वदूद में