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क्या रंज कि यूसुफ़ का ख़रीदार नहीं है | शाही शायरी
kya ranj ki yusuf ka KHaridar nahin hai

ग़ज़ल

क्या रंज कि यूसुफ़ का ख़रीदार नहीं है

क़मर सिद्दीक़ी

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क्या रंज कि यूसुफ़ का ख़रीदार नहीं है
ये शहर कोई मिस्र का बाज़ार नहीं है

क्यूँ मेरी गिरफ़्तारी पे हंगामा है हर सू
वो कौन है जो तेरा गिरफ़्तार नहीं है

किस किस पे इनायत न हुई तेरी नज़र की
बस एक मिरी सम्त गुहर-बार नहीं है

क्यूँ जुरअत-ए-इज़हार पे हैरान हो मेरी
अबरू हैं तुम्हारे कोई तलवार नहीं है

साया है मिरे सर पे 'क़मर' धूप शजर का
बैठा हूँ जहाँ साया-ए-दीवार नहीं है