क्या मिला ऐ ज़िंदगी क़ानून-ए-फ़ितरत से मुझे
कुछ मिला हक़ भी तो बातिल की विसातत से मुझे
मेरे मालिक मैं तकब्बुर से नहीं हूँ सर-बुलंद
सर झुका इतना हुई नफ़रत इताअत से मुझे
मैं वो आशिक़ हूँ कि ख़ुद ही चूमता हूँ अपने हाथ
कब भला फ़ुर्सत मिली अपनी रक़ाबत से मुझे
मैं वो टूटा आइना हूँ आप अपने सामने
जिस में हौल आता है ख़ुद अपनी ही सूरत से मुझे
मैं वो पत्थर हूँ कि जिस में दूध की नहरें भी हैं
तेशा-ए-फ़रहाद मत ठुकरा हिक़ारत से मुझे
मैं वो आलम हूँ कि हर आलम है मुझ में हम-कनार
तू ज़रा पहचान ख़ुद अपनी शबाहत से मुझे
ख़ार-ज़ार-ए-दश्त मैं हूँ और तू सर्व-ए-चमन
तू भला क्यूँ नापता है अपने क़ामत से मुझे
हैफ़ किस के आगे लफ़्ज़ों के दिए रौशन किए
कितनी उम्मीदें हैं अंधों की बसारत से मुझे
मैं कहाँ बैठूँ कि साए भी गुरेज़ाँ मुझ से हैं
अब तो दीवारें भी तकती हैं हिक़ारत से मुझे
मैं गरेबाँ-चाक तारीकी में कब तक मुँह छुपाऊँ
अब तो शर्म आने लगी अपनी नदामत से मुझे
आती हैं वहशत-सरा-ए-दिल से आवाज़ें अजब
देखते हैं अब तो वीराने भी हैरत से मुझे
अब अगर कुछ भी नहीं होता तो शोर-ए-हश्र हो
कम नहीं है इतना सन्नाटा क़यामत से मुझे
कौन नासिर मेरा 'बाक़र' किस को मेरा इंतिज़ार
कू-ए-गुम-नामी में हूँ क्या काम शोहरत से मुझे

ग़ज़ल
क्या मिला ऐ ज़िंदगी क़ानून-ए-फ़ितरत से मुझे
सज्जाद बाक़र रिज़वी