EN اردو
क्या गुमाँ था कि न होगा कोई हम-सर अपना | शाही शायरी
kya guman tha ki na hoga koi ham-sar apna

ग़ज़ल

क्या गुमाँ था कि न होगा कोई हम-सर अपना

हसन अकबर कमाल

;

क्या गुमाँ था कि न होगा कोई हम-सर अपना
दिन ढले साया मुक़ाबिल हुआ बढ़ कर अपना

घर से नालाँ थे मगर देखी है दुनिया हम ने
है अगर कोई अमाँ-गाह तो बस घर अपना

दर्द पे कैसा शरर बन के उठा पहलू में
हम तो यूँ ख़ुश थे कि दिल कर लिया पत्थर अपना

रात-भर कोई न सोए तो सुने शोर-ए-फ़ुग़ाँ
चाँद को दर्द सुनाता है समुंदर अपना

दुख उठाए तो बहुत रंग ख़ुद अपने देखे
कम क़यामत से न था जो भी था मंज़र अपना

रोज़-ओ-शब अपने किसी से नहीं मिलते हैं 'कमाल'
हम तो लाए हैं अलग सब से मुक़द्दर अपना