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क्या ढूँडते हो अब जरस-ए-रफ़्तगाँ की धूल | शाही शायरी
kya DhunDte ho ab jaras-e-raftagan ki dhul

ग़ज़ल

क्या ढूँडते हो अब जरस-ए-रफ़्तगाँ की धूल

मुसव्विर सब्ज़वारी

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क्या ढूँडते हो अब जरस-ए-रफ़्तगाँ की धूल
इक कारवाँ के साथ गई कारवाँ की धूल

कल तक थे मेरा क़ाफ़िला हम जिस के दोस्तो
अंजाम-ए-कार अब हैं उसी कारवाँ की धूल

मदफ़न तिरी गली में बनाने चले तो हैं
ये आँधियाँ बताएँगी हम हैं कहाँ की धूल

रह में ये कौन आबला-पायान-ए-शौक़ हैं
मुड़ मुड़ के देखती है जिन्हें कारवाँ की धूल

लर्ज़ां हैं बाम-ओ-दर पे गई महफ़िलों के साए
आँखों में उड़ रही है दयार-ए-बुताँ की धूल

कैसे तुम्हारी प्यास बुझाएँ मुसाफ़िरो
हम तो हैं एक चश्मा-ए-रेग-ए-रवाँ की धूल

दामन में कौन बाँधे 'मुसव्विर' हमें यहाँ
गर्द-ए-मज़ार हम न किसी आस्ताँ की धूल