क्या ढूँडते हो अब जरस-ए-रफ़्तगाँ की धूल
इक कारवाँ के साथ गई कारवाँ की धूल
कल तक थे मेरा क़ाफ़िला हम जिस के दोस्तो
अंजाम-ए-कार अब हैं उसी कारवाँ की धूल
मदफ़न तिरी गली में बनाने चले तो हैं
ये आँधियाँ बताएँगी हम हैं कहाँ की धूल
रह में ये कौन आबला-पायान-ए-शौक़ हैं
मुड़ मुड़ के देखती है जिन्हें कारवाँ की धूल
लर्ज़ां हैं बाम-ओ-दर पे गई महफ़िलों के साए
आँखों में उड़ रही है दयार-ए-बुताँ की धूल
कैसे तुम्हारी प्यास बुझाएँ मुसाफ़िरो
हम तो हैं एक चश्मा-ए-रेग-ए-रवाँ की धूल
दामन में कौन बाँधे 'मुसव्विर' हमें यहाँ
गर्द-ए-मज़ार हम न किसी आस्ताँ की धूल
ग़ज़ल
क्या ढूँडते हो अब जरस-ए-रफ़्तगाँ की धूल
मुसव्विर सब्ज़वारी

