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कुछ यूँ भी मुझे रास हैं तन्हाइयाँ अपनी | शाही शायरी
kuchh yun bhi mujhe ras hain tanhaiyan apni

ग़ज़ल

कुछ यूँ भी मुझे रास हैं तन्हाइयाँ अपनी

राशिद मुफ़्ती

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कुछ यूँ भी मुझे रास हैं तन्हाइयाँ अपनी
रहती हैं जिलौ में मिरे परछाइयाँ अपनी

मशहूर यही लोग कभी अहल-ए-नज़र थे!
अब ढूँडते फिरते हैं जो बीनाइयाँ अपनी

अपना ही सहारा था सर-ए-म'अरका-ए-ज़ात
किस काम की थीं वर्ना सफ़-आराइयाँ अपनी

मैं और भरे शहर में इस तरह अकेला!
वो सौंप गया है मुझे तन्हाइयाँ अपनी

लौ तुम ने चराग़ों की बढ़ाई तो है 'राशिद'
घेरे में न ले लें तुम्हें परछाइयाँ अपनी