कुछ न होने की हक़ीक़त नहीं जानी यानी
हम हर इसबात पे करते रहे यानी यानी
तह भी इक सत्ह की ताबीर है सुनते थे यही
सत्ह पर तैरने वालों की ज़बानी यानी
मिल गई ख़ाक में बुनियाद-ए-चमन-ज़ार-ए-वजूद
अपनी मेराज को पहुँची हमा-दानी यानी
अपने महमिल से निकल आए जो महमिल में नहीं
वहशत-ए-क़ैस के हैं आज ये मअनी यानी
शोर-ए-दावा-ए-अनल-हक़ है कि थमता ही नहीं
कोई सुनता ही नहीं मेरी कहानी यानी
कोई होने से ये कम है कि हुए जाता हूँ
है न होना मिरे होने की निशानी यानी
हार समझे हो जिसे धार है लम्हों की 'मुहिब'
रिश्ता-ए-उम्र है इक अक्स-ए-रवानी यानी
ग़ज़ल
कुछ न होने की हक़ीक़त नहीं जानी यानी
मुहिब आरफ़ी

