कुछ चमकता सा तह-ए-आब नज़र तो आए
डूबने के लिए गिर्दाब नज़र तो आए
कोई ता'बीर की सूरत भी निकल आएगी
नींद तो आए कभी ख़्वाब नज़र तो आए
बंद कमरे की फ़ज़ा किस को भली लगती है
मेरे अतराफ़ में महताब नज़र तो आए
दो घड़ी ठहरूँ कहीं मैं भी ज़रा दम ले लूँ
राह में ख़ित्ता-ए-शादाब नज़र तो आए
मैं शिकस्ता हूँ इधर तू भी शिकस्ता है उधर
जंग में कोई ज़फ़र-याब नज़र तो आए
मुश्किलें घेर के बैठी हैं मिरा घर 'आलम'
अब ज़रा हल्क़ा-ए-अहबाब नज़र तो आए
ग़ज़ल
कुछ चमकता सा तह-ए-आब नज़र तो आए
आलम ख़ुर्शीद

