कोई सितारा-ए-शब या ग़ुबार था वो भी
ज़मीं पे नाज़-ए-फ़लक का शुमार था वो भी
मैं रेज़ा रेज़ा ज़मीं पर मगर वरा-ए-ज़मीं
नुमूद-ए-पैरहन-ए-तार-तार था वो भी
सिनाँ-ब-दस्त जो आया वो दस्ता-ए-गुल था
जो लाला-रू था सो अम्बोह-ए-ख़ार था वो भी
वो पड़ गया था मगर रंज-ए-ना-गहानी में
गिरह-कुशा गिला-ए-साज़-गार था वो भी
उसी से ख़ाक में रा'नाई-ए-तजम्मुल है
ज़मीं पे झुकता हुआ कोहसार था वो भी
किसी पे जम गई चश्म-ए-गुरेज़-पा आख़िर
अजीब लम्हा-ए-बे-इख़्तियार था वो भी
ग़ज़ल
कोई सितारा-ए-शब या ग़ुबार था वो भी
सय्यद अमीन अशरफ़

