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कोई सिलसिला नहीं जावेदाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी | शाही शायरी
koi silsila nahin jawedan tere sath bhi tere baad bhi

ग़ज़ल

कोई सिलसिला नहीं जावेदाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

अज़हर फ़राग़

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कोई सिलसिला नहीं जावेदाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी
मैं तो हर तरह से हूँ राएगाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

मिरे हम-नफ़स तू चराग़ था तुझे क्या ख़बर मिरे हाल की
कि जिया मैं कैसे धुआँ धुआँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

न तिरा विसाल विसाल था न तिरी जुदाई जुदाई है
वही हालत-ए-दिल-ए-बद-गुमाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

मैं ये चाहता हूँ कि उम्र-भर रहे तिश्नगी मिरे इश्क़ में
कोई जुस्तुजू रहे दरमियाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

मिरे नक़्श-ए-पा तुझे देख कर ये जो चल रहे हैं उन्हें बता
है मिरा सुराग़ मिरा निशाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी