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कोई मौसम हो कुछ भी हो सफ़र करना ही पड़ता है | शाही शायरी
koi mausam ho kuchh bhi ho safar karna hi paDta hai

ग़ज़ल

कोई मौसम हो कुछ भी हो सफ़र करना ही पड़ता है

फ़र्रुख़ जाफ़री

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कोई मौसम हो कुछ भी हो सफ़र करना ही पड़ता है
इधर से बोझ काँधे का उधर करना ही पड़ता है

कहाँ जाते हैं क्या करते हैं किस के साथ रहते हैं
हमें अपना तआ'क़ुब उम्र भर करना ही पड़ता है

वो अपने तन पे सह कर हो कि अपनी जान पर फिर भी
हमें इक मा'रका हर रोज़ सर करना ही पड़ता है

खुला रक्खें न रक्खें घर का दरवाज़ा मगर 'फ़र्रुख़'
सफ़र आँखों को ता-हद्द-ए-नज़र करना ही पड़ता है