कोई भी चीज़ यहाँ वक़्त-ए-ज़रूरत न मिली
कभी सहरा जो मिला भी कहीं वहशत न मिली
बंद कमरे में ये दस्तूर कहाँ से आया
क्यूँ मुझे ख़ुद से भी मिलने की इजाज़त न मिली
क्यूँ हर एक मोड़ पे रोका है तलाशी के लिए
क्यूँ मुझे घर से निकलने की इजाज़त न मिली
अब यही रंज मिरी आँख में आ बैठा है
तोड़ कर आइना देखा कहीं हैरत न मिली
मौज-ए-दरिया थी कहीं और न हवा का झोंका
रेत पर लिक्खी थी जो रात इबारत न मिली
ग़ज़ल
कोई भी चीज़ यहाँ वक़्त-ए-ज़रूरत न मिली
हमदम कशमीरी

