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कोई भी चीज़ यहाँ वक़्त-ए-ज़रूरत न मिली | शाही शायरी
koi bhi chiz yahan waqt-e-zarurat na mili

ग़ज़ल

कोई भी चीज़ यहाँ वक़्त-ए-ज़रूरत न मिली

हमदम कशमीरी

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कोई भी चीज़ यहाँ वक़्त-ए-ज़रूरत न मिली
कभी सहरा जो मिला भी कहीं वहशत न मिली

बंद कमरे में ये दस्तूर कहाँ से आया
क्यूँ मुझे ख़ुद से भी मिलने की इजाज़त न मिली

क्यूँ हर एक मोड़ पे रोका है तलाशी के लिए
क्यूँ मुझे घर से निकलने की इजाज़त न मिली

अब यही रंज मिरी आँख में आ बैठा है
तोड़ कर आइना देखा कहीं हैरत न मिली

मौज-ए-दरिया थी कहीं और न हवा का झोंका
रेत पर लिक्खी थी जो रात इबारत न मिली