कोई बे-जाँ कोई बे-घर नहीं देखा जाता
रोज़ तर्रारा-ए-महशर नहीं देखा जाता
छीन ले हैरत-ए-नज़्ज़ारा ये बीनाई भी
आँख होती है तो मंज़र नहीं देखा जाता
बे-हिसी शर्त है जीने के लिए ये दुनिया
ख़म-ए-अबरू है कि ख़ंजर नहीं देखा जाता
देखिए ख़ुसरवी-ओ-मुंसफ़ी-ओ-दाद-रसी
ताज-ओ-तख़्त-ओ-ज़र-ओ-लश्कर नहीं देखा जाता
खेल बच्चों का नहीं शो'ला-ए-सद-ख़िरमन है
गुल-ए-ख़ूबी है तो छूकर नहीं देखा जाता
दीद की शब थी कि बुतलान था उस दा'वे का
रात में मेहर-ए-मुनव्वर नहीं देखा जाता
ग़ज़ल
कोई बे-जाँ कोई बे-घर नहीं देखा जाता
सय्यद अमीन अशरफ़

