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कितना हुशियार हुआ कितना वो फ़रज़ाना हुआ | शाही शायरी
kitna hushiyar hua kitna wo farzana hua

ग़ज़ल

कितना हुशियार हुआ कितना वो फ़रज़ाना हुआ

ऐन सलाम

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कितना हुशियार हुआ कितना वो फ़रज़ाना हुआ
तेरी मस्ती-भरी आँखों का जो दीवाना हुआ

आह ये आलम-ए-ग़ुर्बत ये शब-ए-तन्हाई
इक क़यामत हुई ध्यान ऐसे में तेरा न हुआ

इक जहाँ आज भी है उस के तिलिस्मों में असीर
सब का हो कर भी जो अय्यार किसी का न हुआ

तुझ को अपनाने का यारा था न खोने ही का ज़र्फ़
दिल-ए-हैराँ इसी उलझावे में दीवाना हुआ

कैफ़ियत उस की जुदाई की न पूछो यारो
दिल तही हो के भी छलका हुआ पैमाना हुआ

हाए वो लुत्फ़-ओ-करम उस के सितम से पहले
कर के बेगाना ज़माने से जो बेगाना हुआ

रोज़-ए-महशर न बनाया शब-ए-ग़म को हम ने
ज़िक्र तेरा ही बस अफ़्साना दर अफ़्साना हुआ

कर्ब राहत है कभी और कभी राहत कर्ब
इक मुअम्मा ये मिज़ाज-ए-दिल-ए-दीवाना हुआ

एक महसूस क़राबत की वो ख़ुशबू-ए-बदन
जिस को छूने का तसव्वुर में भी याराना हुआ

कैफ़ियत दर्द-ए-तमन्ना की वही है कि जो थी
तेरा इज़हार-ए-वफ़ा भी दम-ए-ईसा न हुआ

जाने किस जान-ए-बहाराँ की लगन है कि 'सलाम'
दिल सा मामूरा-ए-वहशत कभी सहरा न हुआ