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किसू को मुझ से ने मुझ को किसू से काम रहता है | शाही शायरी
kisu ko mujhse ne mujhko kisu se kaam rahta hai

ग़ज़ल

किसू को मुझ से ने मुझ को किसू से काम रहता है

मीर असर

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किसू को मुझ से ने मुझ को किसू से काम रहता है
मिरे दिल में सिवा तेरे ख़ुदा का नाम रहता है

कुछ इन रोज़ों दिल अपना सख़्त बे-आराम रहता है
इसी हालत में ले कर सुब्ह से ता-शाम रहता है

कलेजा पक गया है क्या कहूँ इस दिल के हाथों से
हमेशा कुछ न कुछ इस में ख़याल-ए-ख़ाम रहता है

बयाँ मैं क्या करूँ उस से अब आगे अपनी नाकामी
तिरे ये तौर और मुझ को तुझी से काम रहता है

बला जाने 'असर' दौराँ ये कीधर चर्ख़ मारे है
हमारी बज़्म में दिन रात दौर-ए-जाम रहता है