किसी ने चेहरे पे बिखरा लिया था ज़ुल्फ़ों को
ज़रा सी बात थी बस ले उड़े हैं दीवाने
ये फूल खिलते हैं गुलज़ार में कि पर्दे से
बढ़ा के हाथ कोई दे रहा है पैमाने
हुई है बाइस-ए-तुग़्यान-ए-इश्क़ गर्मी-ए-हुस्न
जले न शम्अ' तो क्यूँ घिर के आएँ परवाने
जहान जिन से था इक बज़्म ना-ओ-नोश तमाम
कहाँ वो बादा-गुसार अब कहाँ वो मयख़ाने
जो अक़्ल वाले हैं चलते हैं अपनी अपनी राह
सब इक रविश पे चले जा रहे हैं दीवाने
नहीं है फ़र्क़ कोई नूर और ज़ुल्मत में
हवास गुम हैं वो पल्टा लिया है दुनिया ने
चमक उठें तो मह-ओ-महर को भी कर दें मांद
वो ज़र्रे गोद में अपनी लिए हैं वीराने
किसी के तीर लगे सीने में ख़ुदा न करे
हमारे दिल में है क्या दर्द कोई क्या जाने
हमारे वास्ते साक़ी पियाला-ओ-ख़ुम एक
छलक चलें जो वो होते हैं और पैमाने
ख़ुदा समझने से आख़िर बचा लिया मुझ को
हज़ार शुक्र मिरे ऐब तुम ने पहचाने
है दिल में आग तो आँखों में लाला-ज़ार 'जिगर'
निगाह-ए-नाज़ के अंदाज़ कोई क्या जाने
ग़ज़ल
किसी ने चेहरे पे बिखरा लिया था ज़ुल्फ़ों को
जिगर बरेलवी

