किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की
धुआँ धुआँ है फ़ज़ा मेरी हर कहानी की
चलो निकालो मिरे पाँव में चुभा तारा
ज़मीं की सत्ह तुम्हीं ने तो आसमानी की
गुनाह-ए-इश्क़ किया और कोई सज़ा न हुई
ज़रूर तुम ने सबूतों से छेड़ख़्वानी की
तिरा ख़याल हुआ कैनवस पे मेहमाँ कल
तमाम रंगों ने मिल कर के मेज़बानी की
ग़ज़ल
किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की
स्वप्निल तिवारी

