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किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की | शाही शायरी
kisi ne bhi na meri Thik tarjumani ki

ग़ज़ल

किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की

स्वप्निल तिवारी

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किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की
धुआँ धुआँ है फ़ज़ा मेरी हर कहानी की

चलो निकालो मिरे पाँव में चुभा तारा
ज़मीं की सत्ह तुम्हीं ने तो आसमानी की

गुनाह-ए-इश्क़ किया और कोई सज़ा न हुई
ज़रूर तुम ने सबूतों से छेड़ख़्वानी की

तिरा ख़याल हुआ कैनवस पे मेहमाँ कल
तमाम रंगों ने मिल कर के मेज़बानी की